ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे। जिस पानी को लोग अमृत समझकर रोज़ पी रहे हैं, वही पानी अब धीमा ज़हर बन चुका है। ग्रेटर नोएडा के ग्रामीण इलाकों में पेयजल को लेकर एक ऐसा चौंकाने वाला और डराने वाला खुलासा सामने आया है, जिसने प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और आम जनता—तीनों की नींद उड़ा दी है।
गलगोटिया विश्वविद्यालय और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (AKTU) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन में यह सामने आया है कि ग्रेटर नोएडा के कई गांवों के पेयजल में कैंसरकारी धातुएँ सुरक्षित सीमा से 60 गुना तक अधिक पाई गई हैं।
यह शोध केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो चुका है, क्योंकि इसे दुनिया की प्रतिष्ठित मेडिकल साइंस जर्नल Clinical Epigenetics में प्रकाशित किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित, खतरे की घंटी
यह अध्ययन केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन पर पड़ रहे गंभीर प्रभावों को उजागर करता है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशन का मतलब है कि यह मामला अब सिर्फ ग्रेटर नोएडा या उत्तर प्रदेश का नहीं रहा, बल्कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ने भी इसे गंभीर माना है।
वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में ग्रेटर नोएडा के ग्रामीण इलाकों में कैंसर, किडनी फेल्योर, लिवर डिज़ीज़ और सांस से जुड़ी बीमारियाँ भयावह रूप ले सकती हैं।
पाँच गांवों के पानी में ज़हर
शोध के तहत ग्रेटर नोएडा के पाँच ग्रामीण क्षेत्रों से पेयजल के नमूने एकत्र किए गए।
मानसून के बाद जब इन नमूनों की आधुनिक प्रयोगशालाओं में जांच की गई, तो नतीजे चौंकाने वाले थे—
क्रोमियम (Chromium) –
सुरक्षित मानक से लगभग 60 गुना अधिक
यह धातु सीधे कैंसर से जुड़ी मानी जाती है
कैडमियम (Cadmium) –
अत्यंत विषैली और जानलेवा
लंबे समय तक शरीर में जमा होकर गुर्दे, यकृत और फेफड़ों को नष्ट करती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये दोनों धातुएँ अगर लंबे समय तक शरीर में प्रवेश करती रहें, तो इंसान अंदर से धीरे-धीरे खोखला हो जाता है।
कैंसर और जीन पर सीधा हमला
इस अध्ययन का सबसे डरावना पहलू केवल पानी की गुणवत्ता नहीं, बल्कि मानव शरीर के जीन (DNA) पर पड़ रहा उसका प्रभाव है।
गलगोटिया विश्वविद्यालय के प्रो. (डॉ.) अभिमन्यु कुमार झा के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने इन गांवों में लंबे समय से रह रहे 25 कैंसर रोगियों के रक्त नमूनों की जांच की।
जांच में सामने आया कि— 64 प्रतिशत मरीजों में गंभीर आनुवंशिक (Genetic) परिवर्तन पाए गए
ये परिवर्तन शरीर की कैंसर से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता को कमजोर कर देते हैं
प्रो. झा के मुताबिक,
“क्रोमियम और कैडमियम जैसी भारी धातुएँ शरीर के कैंसर-रोधी जीन को निष्क्रिय कर देती हैं और डीएनए को स्थायी नुकसान पहुँचाती हैं। यह नुकसान वर्षों तक शरीर में छिपा रहता है और अचानक घातक रूप ले सकता है।”
‘धीमा ज़हर’ बनता भूजल
वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को ‘Slow Poisoning’ यानी धीमा ज़हर करार दिया है।
इसका मतलब है कि—
व्यक्ति रोज़ थोड़ा-थोड़ा ज़हर पी रहा है
असर तुरंत नहीं, बल्कि 5–10 साल बाद सामने आता है
तब तक बीमारी इतनी बढ़ चुकी होती है कि इलाज मुश्किल हो जाता है
रिपोर्ट के अनुसार, यह ज़हर धीरे-धीरे—
किडनी को फेल करता है
लिवर को खराब करता है
फेफड़ों को कमजोर करता है
और अंततः कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को जन्म देता है

