ग्रेटर नोएडा, द न्यूज क्लिक।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब ग्रेटर नोएडा के नन्हे विद्यार्थियों ने यह साबित कर दिया कि यदि बचपन से ही प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता विकसित की जाए, तो आने वाली पीढ़ियां धरती को और बेहतर बना सकती हैं। इसी सोच को साकार करते हुए विद्यालय के इको क्लब द्वारा 30 और 31 मई को दो दिवसीय विशेष पर्यावरण कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों ने केवल किताबों से नहीं बल्कि अपने हाथों से सीखकर पर्यावरण संरक्षण का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
यह कार्यशाला केवल एक शैक्षणिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि प्रकृति के साथ बच्चों के भावनात्मक और व्यवहारिक जुड़ाव का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी बनी। दो दिनों तक चले इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने जैव विविधता संरक्षण, पौधारोपण, बीज संरक्षण, कचरा प्रबंधन और कंपोस्टिंग जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों में भाग लेकर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा।
पहला दिन: बीज गेंदों के जरिए हरियाली बढ़ाने का अनोखा अभियान
कार्यशाला के पहले दिन का मुख्य विषय था “जैव विविधता के लिए बीज गेंदें”। इस गतिविधि में बच्चों ने मिट्टी, जैविक खाद और विभिन्न पौधों के बीजों का उपयोग करके पोषक तत्वों से भरपूर बीज गेंदें तैयार कीं। इन बीज गेंदों में गेंदा (मैरीगोल्ड), अपराजिता, तुलसी, पपीता और रीठा (सोप नट) जैसे उपयोगी और पर्यावरण के लिए लाभकारी पौधों के बीज शामिल किए गए। विद्यार्थियों ने बड़ी उत्सुकता और रचनात्मकता के साथ इन बीज गेंदों को तैयार किया और जाना कि कैसे इन्हें विभिन्न स्थानों पर फेंककर बिना विशेष देखभाल के भी हरियाली बढ़ाई जा सकती है।
हर बच्चे ने लिया हरियाली बढ़ाने का संकल्प
कार्यशाला के दौरान बच्चों ने संकल्प लिया कि वे अपने घर, स्कूल और आसपास के क्षेत्रों में अधिक से अधिक पौधे लगाने के लिए लोगों को प्रेरित करेंगे। विद्यार्थियों ने कहा कि वे केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाएंगे।
शिक्षकों ने बताया कि यदि बच्चों में प्रारंभिक अवस्था से ही पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित हो जाए तो वे बड़े होकर जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं। यही कारण है कि विद्यालय समय-समय पर ऐसी गतिविधियों का आयोजन करता रहता है।
दूसरा दिन: कचरे को समझने और उसे संसाधन में बदलने की सीख
कार्यशाला के दूसरे दिन का विषय था “ट्रैशोनॉमिक्स और कंपोस्टिंग की कला”। इस सत्र में विद्यार्थियों को यह समझाया गया कि आज दुनिया में बढ़ते कचरे का संकट किस प्रकार पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है। बच्चों ने “ट्रैशोनॉमिक्स” विषय के माध्यम से जाना कि घरों, बाजारों और संस्थानों से निकलने वाला कचरा यदि सही तरीके से प्रबंधित नहीं किया जाए तो वह मिट्टी, पानी और हवा को प्रदूषित कर सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी समझा कि कचरे को सही तरीके से पुनर्चक्रित और पुन: उपयोग करके पर्यावरणीय समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
रसोई के कचरे से बनाया ‘काला सोना’
कार्यशाला का सबसे रोमांचक हिस्सा कंपोस्टिंग गतिविधि रही। बच्चों ने स्वयं रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे, सूखी पत्तियों और अन्य प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग कर खाद बनाने की प्रक्रिया सीखी। उन्हें बताया गया कि रसोई के हरे कचरे और सूखे भूरे पदार्थों की सही परतें बनाकर उत्कृष्ट जैविक खाद तैयार की जा सकती है, जिसे पर्यावरण विशेषज्ञ “ब्लैक गोल्ड” (काला सोना) भी कहते हैं।
जीरो-वेस्ट भविष्य की ओर मजबूत कदम
कार्यशाला का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं बल्कि बच्चों में व्यवहारिक बदलाव लाना भी था। इस दौरान विद्यार्थियों को “जीरो वेस्ट लाइफस्टाइल” अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। उन्हें बताया गया कि यदि हर व्यक्ति अपने घर में जैविक कचरे की कंपोस्टिंग शुरू कर दे और प्लास्टिक के उपयोग को कम करे, तो पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश लेकर लौटे नन्हे इको चैंप्स
दो दिवसीय कार्यशाला के समापन पर बच्चों के चेहरे पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने न केवल नई चीजें सीखीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी गहराई से समझा।
विद्यालय प्रशासन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़ाकर वास्तविक जीवन की चुनौतियों के समाधान से जोड़ते हैं। यही बच्चे भविष्य में पर्यावरण संरक्षण के सच्चे दूत बनकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह कार्यशाला इस बात का जीवंत उदाहरण रही कि यदि बच्चों को सही दिशा और अवसर दिए जाएं तो वे न केवल सीख सकते हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण के लिए प्रेरणास्रोत भी बन सकते हैं।

