ग्रेटर नोएडा, द न्यूज क्लिक। भाषाई नवाचार, सहज एवं सरल भाषा प्रयोग और व्याकरण आधारित अवधारणा गीतों के लिए अपनी अलग पहचान बनाने वाले दिल्ली पब्लिक स्कूल, ग्रेटर नोएडा के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं एनसीईआरटी की ‘सारंगी’ पाठ्यपुस्तक समिति के सदस्य डॉ. विनोद सिंह चौहान ‘प्रसून’ को महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक निर्माण एवं पाठ्यक्रम संशोधन मंडल ‘बालभारती’, पुणे की ओर से भाषा विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित किया गया। पुणे में आयोजित दो दिवसीय अभिमुखीकरण कार्यक्रम में उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भाषा शिक्षण और भविष्य की पाठ्यपुस्तकों के स्वरूप को लेकर अपने विचार साझा किए।
21 और 22 अगस्त को आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षा, भाषा, पाठ्यक्रम निर्माण और पाठ्यपुस्तक लेखन से जुड़े देशभर के विशेषज्ञों के साथ विभिन्न भारतीय भाषाओं के विद्वानों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यपुस्तकों के निर्माण, भाषा शिक्षण में नए प्रयोगों और विद्यार्थियों की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्य सामग्री तैयार करने को लेकर विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श करना रहा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यपुस्तक निर्माण पर मंथन
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में एनसीईआरटी के निदेशक प्रो. दिनेश कुमार सकलानी, ज्ञान प्रबोधिनी प्रशाला, पुणे के प्राचार्य डॉ. (वाचस्पति) मिलिंद नाइक तथा एनएसटीसी के कार्यक्रम कार्यालय प्रमुख प्रो. गजानन लोंढे ने भाषाविदों और शिक्षा विशेषज्ञों को संबोधित किया। विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मूल उद्देश्यों के अनुरूप विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन, गतिविधि आधारित शिक्षण तथा आधुनिक तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल पर चर्चा की। इस दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा की तैयारी का माध्यम न होकर विद्यार्थियों में जिज्ञासा, रचनात्मकता, तार्किक सोच और जीवन कौशल विकसित करने का साधन बनें।
कार्यक्रम में विभिन्न भारतीय भाषाओं के विशेषज्ञों ने अपने-अपने अनुभव और विचार साझा किए। बदलते शैक्षणिक परिवेश में भाषा की भूमिका, बच्चों की सीखने की शैली में आ रहे बदलाव और पाठ्यपुस्तकों को अधिक रोचक एवं विद्यार्थी-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
‘पाठ्यपुस्तक निर्माण केवल लेखन नहीं, जीवन निर्माण का दायित्व’
समापन सत्र में ‘युग के अनुकूल नवाचारी पुस्तक निर्माण’ विषय पर अपने विचार रखते हुए डॉ. विनोद ‘प्रसून’ ने कहा कि पाठ्यपुस्तक निर्माण केवल लेखन का कार्य नहीं है, बल्कि यह चरित्र निर्माण और जीवन निर्माण का दायित्व भी है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु ऐसी होनी चाहिए, जो विद्यार्थियों को केवल जानकारी देने के बजाय उन्हें सोचने, सवाल करने, खोजने और अपने ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने के लिए प्रेरित करे। उन्होंने विद्यार्थी-केंद्रित एवं गतिविधि आधारित शिक्षण को पाठ्यपुस्तक निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, मूल्यों और समकालीन आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाकर पाठ्यसामग्री तैयार करने की जरूरत है।
डॉ. ‘प्रसून’ ने कहा कि आज की पीढ़ी तेजी से बदलते तकनीकी और सामाजिक परिवेश में आगे बढ़ रही है। ऐसे में पाठ्यपुस्तकों को भी समय के साथ विकसित होना होगा। विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने के लिए पुस्तकों में ज्ञान के साथ-साथ चिंतन, प्रयोग, रचनात्मकता, संवाद और अभिव्यक्ति के पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए।
डॉ. प्रसून ने प्रस्तुत की ‘सप्त अ’ अवधारणा
कार्यक्रम के दौरान डॉ. विनोद ‘प्रसून’ ने पाठ्यपुस्तक निर्माण के लिए अपनी विशेष ‘सप्त अ’ अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि प्रभावी और युगानुकूल पाठ्यपुस्तक निर्माण के लिए सात प्रमुख आधारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इनमें अध्येता-भाव, अनुसंधित्सुता, अद्यतनता, अनुकूलता, अवसर, अभिव्यक्ति और अंतःकरण को शामिल किया गया है।
उनके अनुसार, पाठ्यपुस्तक में विद्यार्थी के भीतर सीखने की इच्छा और अध्येता-भाव पैदा होना चाहिए। उसमें नई चीजों को जानने और खोजने की जिज्ञासा विकसित होनी चाहिए। साथ ही पाठ्यसामग्री समय के अनुरूप अद्यतन और विद्यार्थियों की आयु, क्षमता एवं परिवेश के अनुकूल होनी चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा और विचार व्यक्त करने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। पाठ्यपुस्तक का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास तक सीमित न होकर विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों और अंतःकरण की समझ को भी मजबूत करना होना चाहिए।
डॉ. ‘प्रसून’ की इस अवधारणा को कार्यक्रम में मौजूद शिक्षा विशेषज्ञों और विभिन्न भारतीय भाषाओं के विद्वानों ने सराहा। विशेषज्ञों ने माना कि बदलते शैक्षणिक परिवेश में पाठ्यपुस्तक निर्माण को अधिक व्यापक दृष्टिकोण के साथ देखने की आवश्यकता है और ऐसी अवधारणाएं इस दिशा में उपयोगी हो सकती हैं।
भाषा शिक्षण में सरलता और नवाचार पर जोर
डॉ. विनोद सिंह चौहान ‘प्रसून’ लंबे समय से भाषा शिक्षण को सहज, सरल और रुचिकर बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। व्याकरण जैसी विषयवस्तु को विद्यार्थियों के लिए रोचक बनाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयोग और अवधारणा गीत भी चर्चा में रहे हैं। उनका मानना है कि भाषा सीखने की प्रक्रिया बच्चों के लिए बोझिल नहीं होनी चाहिए। यदि भाषा और व्याकरण को गतिविधियों, गीतों, उदाहरणों और दैनिक जीवन से जोड़ दिया जाए तो विद्यार्थी उसे अधिक आसानी से समझ और आत्मसात कर सकते हैं।
इसी दृष्टिकोण को पाठ्यपुस्तक निर्माण से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तकों में ऐसे अभ्यास और गतिविधियां शामिल की जानी चाहिए, जो विद्यार्थियों को कक्षा से बाहर की दुनिया से भी जोड़ें। इससे शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान न रहकर अनुभव आधारित सीखने की प्रक्रिया बन सकेगी।
‘बालभारती’ की निदेशक ने किया सम्मानित
कार्यक्रम के समापन समारोह में ‘बालभारती’ की निदेशक डॉ. अनुराधा ओक ने डॉ. विनोद ‘प्रसून’ को उनके शैक्षिक एवं भाषाई योगदान के लिए सम्मानित किया। यह सम्मान उनके द्वारा भाषा शिक्षण, पाठ्यपुस्तक निर्माण और शैक्षणिक नवाचार के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना के रूप में दिया गया। इस अवसर पर विशेषाधिकारी-हिंदी भाषा एवं पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति की समन्वयक डॉ. अलका पोतदार, हिंदी विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र पाण्डेय सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के विद्वान, शिक्षाविद और विशेषज्ञ मौजूद रहे।
ग्रेटर नोएडा के लिए भी उपलब्धि
डॉ. विनोद ‘प्रसून’ को राष्ट्रीय स्तर के इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक मंच पर भाषा विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित किया जाना ग्रेटर नोएडा के शिक्षा जगत के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। दिल्ली पब्लिक स्कूल, ग्रेटर नोएडा में हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए वे भाषा शिक्षण में नए प्रयोगों और विद्यार्थियों के लिए सरल एवं प्रभावी शिक्षण पद्धतियों को बढ़ावा दे रहे हैं। एनसीईआरटी की ‘सारंगी’ पाठ्यपुस्तक समिति से जुड़े होने के कारण उन्हें पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया और विद्यार्थियों की बदलती शैक्षणिक जरूरतों को करीब से समझने का अवसर भी मिला है। पुणे में ‘बालभारती’ के राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में उनकी सहभागिता इसी अनुभव को व्यापक शैक्षणिक विमर्श से जोड़ती है।
कार्यक्रम में रखे गए उनके विचारों ने इस बात को रेखांकित किया कि भविष्य की पाठ्यपुस्तकें केवल सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में चिंतन, जिज्ञासा, रचनात्मकता, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति विकसित करने का प्रभावी माध्यम होनी चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बदलते परिदृश्य में भाषा और पाठ्यपुस्तक निर्माण को लेकर डॉ. ‘प्रसून’ की ‘सप्त अ’ अवधारणा इसी व्यापक उद्देश्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में सामने आई।

