यूपी, लखनऊ, द न्यूज क्लिक। उत्तर प्रदेश पुलिस में कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके पद से नहीं बल्कि उनकी कार्यशैली, ईमानदारी, साहस और जनता के प्रति प्रतिबद्धता से बनती है। ADG नवीन अरोड़ा भी ऐसे ही अधिकारियों में गिने जाते हैं। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में एसपी, एसएसपी, डीआईजी, आईजी और एडीजी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी संभाल चुके नवीन अरोड़ा के पुलिस करियर का एक महत्वपूर्ण अध्याय उस समय का है, जब सोनभद्र सहित पूर्वांचल के कई इलाकों में नक्सलवाद बड़ी चुनौती बना हुआ था। वर्ष 2002 में सोनभद्र के पुलिस कप्तान के रूप में तैनाती के दौरान नवीन अरोड़ा ने नक्सल प्रभावित और दुर्गम इलाकों में पुलिसिंग का अलग उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके साथ तत्कालीन जिलाधिकारी भगवान शंकर भी रहे, जिन्होंने बाद में भारत सरकार में गृह सचिव की जिम्मेदारी संभाली। इसी दौर की एक तस्वीर इन दोनों अधिकारियों की कार्यशैली और उस समय की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों की झलक देती है। तस्वीर में नवीन अरोड़ा एक हाथ में AK-47 और दूसरे हाथ में जूता लिए नजर आ रहे हैं। यह दृश्य सोन नदी क्षेत्र से लौटने के दौरान का बताया जाता है।
नक्सलवाद के कठिन दौर में संभाली सोनभद्र की कमान
उस समय उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सोनभद्र भी प्रमुख जिलों में शामिल था। जंगलों और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच पुलिस के सामने नक्सली गतिविधियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सुरक्षा बड़ी चुनौती थी। ADG नवीन अरोड़ा ने पुलिस कप्तान के रूप में खुद को केवल कार्यालयी बैठकों और फाइलों तक सीमित नहीं रखा। वह दुर्गम इलाकों और जंगलों में पुलिस टीमों के साथ पहुंचते थे और स्थानीय आदिवासी समुदायों की समस्याओं को समझने का प्रयास करते थे। थोड़े समय के नोटिस पर भी उनके कठिन क्षेत्रों में जाने की तैयारी को उनकी कार्यशैली का हिस्सा बताया जाता है।
उनकी सख्त और पारदर्शी कार्यशैली का असर नक्सलवाद के साथ-साथ अवैध खनन और अन्य आपराधिक गतिविधियों से जुड़े नेटवर्क पर भी पड़ा। बताया जाता है कि उनकी कार्रवाई से कोयला और खनन माफिया पर दबाव बढ़ा और उन्हें अपनी गतिविधियों के तौर-तरीकों में बदलाव करना पड़ा।
ईमानदार कार्यशैली के कारण हुआ तबादला!
नवीन अरोड़ा की कार्यशैली जहां आम नागरिकों और ईमानदार अधिकारियों के लिए भरोसे का कारण बनी, वहीं कथित तौर पर प्रभावशाली हितों से जुड़े लोगों के लिए उनकी सख्ती असहज थी। इसी बीच उनका सोनभद्र से तबादला कर दिया गया। उनके तबादले के बाद स्थानीय नागरिकों में निराशा और नाराजगी की चर्चा भी सामने आई। उनके समर्थकों और उन्हें करीब से जानने वालों का मानना रहा कि सोनभद्र जैसे चुनौतीपूर्ण जिले में उनकी कार्यशैली ने पुलिस प्रशासन के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत किया था।

24 साल पुरानी किताब और आज का सम्मान
IG रहे नवीन अरोड़ा के सोनभद्र कार्यकाल को याद करते हुए एक दिलचस्प प्रसंग भी सामने आया है। वर्ष 2006 में नक्सलवाद पर “नक्सली आतंक और सोनभद्र” नामक पुस्तक प्रकाशित की गई थी। पुस्तक के पृष्ठ 21 पर ईमानदार अधिकारियों के सोनभद्र में लंबे समय तक टिक न पाने को लेकर टिप्पणी की गई थी।
लगभग 24 वर्ष बाद उसी पुस्तक की एक प्रति नवीन अरोड़ा को भेंट करना लेखक के लिए भावनात्मक और सम्मान का विषय रहा। यह मुलाकात उनके सोनभद्र कार्यकाल की पुरानी यादों को फिर से सामने ले आई।
आज उसी क्षेत्र के बड़े हिस्से की जिम्मेदारी
समय बदला और नवीन अरोड़ा ने पुलिस सेवा में आगे बढ़ते हुए कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वाराणसी जोन के एडीजी के रूप में उनकी जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली जैसे जिले भी शामिल हैं, जो कभी नक्सली गतिविधियों से प्रभावित रहे हैं। नक्सलवाद पर प्रभावी नियंत्रण के बाद इन क्षेत्रों की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। ऐसे में जिस अधिकारी ने दो दशक से अधिक समय पहले सोनभद्र की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को करीब से देखा था, उसका आज उसी क्षेत्र के महत्वपूर्ण हिस्से की पुलिस व्यवस्था में शीर्ष स्तर पर जिम्मेदारी संभालना एक अलग ही संयोग माना जा रहा है।
जनता की शिकायतों पर त्वरित प्रतिक्रिया की छवि
नवीन अरोड़ा की पहचान केवल सख्त पुलिस अधिकारी के तौर पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों की समस्याओं को सुनने और उनके समाधान के लिए प्रयास करने वाले अधिकारी के रूप में भी बताई जाती है। उनकी कार्यशैली में ईमानदारी, पारदर्शिता, अनुशासन और जनसेवा को प्रमुख माना जाता है। पुलिस सेवा में लंबे अनुभव के दौरान उन्होंने अलग-अलग जिलों और जोन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में वह स्पष्ट निर्णय लेने और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में मौके पर पहुंचकर स्थिति को समझने में विश्वास रखते हैं।
कुछ अधिकारी सिर्फ पद संभालते हैं, कुछ अपनी छाप छोड़ जाते हैं
नवीन अरोड़ा की पुलिस यात्रा को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि किसी अधिकारी की पहचान केवल उसके पद और रैंक से नहीं बनती। साहस, सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही किसी अधिकारी को लंबे समय तक यादगार बनाती है। सोनभद्र के नक्सल प्रभावित दौर से लेकर आज एडीजी जैसे महत्वपूर्ण पद तक का उनका सफर इसी कार्यशैली की एक मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दो दशक से अधिक पुरानी तस्वीर आज भी उस दौर की कठिन पुलिसिंग और मैदान में उतरकर जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी की याद दिलाती है।

