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Wednesday, October 21, 2026
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    Noida DM News : नोएडा की DM मेधा रूपम ने कमिश्नरेट की शक्तियों पर रखा प्रशासन का पक्ष, 13 जनवरी 2020 की शासन अधिसूचना का हवाला देकर बताया—पुलिस आयुक्त और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी गई थीं निर्धारित मजिस्ट्रेटीय शक्तियां, धारा 130 के आदेश पर भी डीएम कार्यालय ने दी स्थिति स्पष्ट

    गौतमबुद्ध नगर से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब जिले में जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नरेट के बीच मजिस्ट्रेटीय शक्तियों के बंटवारे को लेकर बहस तेज हो गई है। डीएम कार्यालय द्वारा 13 जनवरी 2020 की शासन अधिसूचना सामने रखे जाने से यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि संबंधित घटना या कार्रवाई के समय किस अधिकारी के पास कौन-सी वैधानिक शक्ति थी। अब पूरे मामले को समझने के लिए हाईकोर्ट के आदेश, डीएम कार्यालय के स्पष्टीकरण और 13 जनवरी 2020 की शासन अधिसूचना को साथ रखकर देखना होगा

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    नोएडा, द न्यूज क्लिक। गौतमबुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था के तहत पुलिस अधिकारियों को प्रदान की गई मजिस्ट्रेटीय शक्तियों को लेकर जिलाधिकारी मेधा रूपम की ओर से महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण सामने आया है। डीएम कार्यालय की ओर से जारी प्रेस नोट के साथ उत्तर प्रदेश शासन की 13 जनवरी 2020 की अधिसूचना भी सामने रखी गई है। इसमें कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के बाद पुलिस आयुक्त तथा कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को प्रदान की गई विभिन्न मजिस्ट्रेटीय शक्तियों का उल्लेख किया गया है।

    यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब गौतमबुद्ध नगर से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद जिलाधिकारी की भूमिका को लेकर चर्चा तेज हुई है। डीएम कार्यालय की ओर से जारी जानकारी का मुख्य आधार यह है कि कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के बाद शासन ने कई कानूनों के अंतर्गत निर्धारित मजिस्ट्रेटीय अधिकार पुलिस अधिकारियों को प्रदान किए थे।

    डीएम ने स्पष्ट किया—कमिश्नरेट व्यवस्था में बदला अधिकारों का स्वरूप

    डीएम मेधा रूपम की ओर से जारी स्पष्टीकरण के अनुसार, गौतमबुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद कानून-व्यवस्था से संबंधित कई महत्वपूर्ण शक्तियां पुलिस आयुक्त को सौंपी गईं। ऐसे में कमिश्नरेट व्यवस्था में जिलाधिकारी की पारंपरिक मजिस्ट्रेटीय भूमिका और अधिकारों का स्वरूप पूर्व की व्यवस्था से अलग हो गया। डीएम कार्यालय की ओर से जारी 2020 की अधिसूचना इसी प्रशासनिक व्यवस्था को समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत की गई है।

    13 जनवरी 2020 की अधिसूचना में क्या प्रावधान हैं?

    जारी अधिसूचना में तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 20 के तहत प्रदान की गई शक्तियों का उल्लेख है। अधिसूचना के अनुसार, राज्यपाल ने अनुसूची में उल्लिखित विभिन्न अधिनियमों के संबंध में पुलिस आयुक्त को कार्यपालक मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट और जिला मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की थीं। इसके साथ ही धारा 21 के तहत लखनऊ नगर और गौतमबुद्ध नगर में तैनात संयुक्त पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त, उप पुलिस आयुक्त, अपर उप पुलिस आयुक्त और सहायक पुलिस आयुक्तों को निर्धारित प्रयोजनों के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान किए जाने का उल्लेख है।

    इसका अर्थ यह है कि कमिश्नरेट प्रणाली में पुलिस अधिकारियों को केवल पुलिसिंग की जिम्मेदारी ही नहीं दी गई, बल्कि शासन के आदेश के अनुसार उन्हें कुछ मामलों में निर्धारित मजिस्ट्रेटीय अधिकार भी प्रदान किए गए।

    किन कानूनों के तहत मिली थीं शक्तियां?

    अधिसूचना की अनुसूची में कई महत्वपूर्ण कानून शामिल हैं। इनमें उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अधिनियम, 1970, विष अधिनियम, 1919, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956, पुलिस (द्रोह-उद्दीपन) अधिनियम, 1922, पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, विस्फोटक अधिनियम, 1884 और कारागार अधिनियम, 1894 शामिल हैं।

    इसके अलावा शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923, विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946, गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967, पुलिस अधिनियम, 1861, उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा अधिनियम, 1944 और उत्तर प्रदेश अग्नि निवारण एवं अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 2005 भी अनुसूची में शामिल हैं।।इसी सूची में उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 भी शामिल है, जो कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानून है।

    कार्यपालक मजिस्ट्रेट की भूमिका को लेकर भी स्पष्टीकरण

    डीएम कार्यालय के स्पष्टीकरण में यह भी बताया गया है कि कमिश्नरेट व्यवस्था के तहत निर्धारित कार्यपालक मजिस्ट्रेटीय कार्यों के लिए अधिकृत पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर संबंधित शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक ऐसी कार्यवाही के लिए फाइल अनिवार्य रूप से जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी या उप जिलाधिकारी के समक्ष ही प्रस्तुत की जाए। हालांकि, किस मामले में किस अधिकारी के पास कौन-सी शक्ति थी और संबंधित कार्रवाई के समय कौन-सा वैधानिक प्रावधान लागू था, यह संबंधित मामले के तथ्यों और लागू अधिसूचना पर निर्भर करेगा।

    धारा 130 के आदेश पर भी डीएम कार्यालय ने दी स्थिति स्पष्ट

    डीएम मेधा रूपम की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी की ओर से धारा 130 के तहत कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। डीएम कार्यालय की ओर से यह बात उस विवाद के संदर्भ में स्पष्ट की गई है, जिसमें जिलाधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठे हैं।

    हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद फिर चर्चा में कमिश्नरेट व्यवस्था

    गौतमबुद्ध नगर से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब जिले में जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नरेट के बीच मजिस्ट्रेटीय शक्तियों के बंटवारे को लेकर बहस तेज हो गई है। डीएम कार्यालय द्वारा 13 जनवरी 2020 की शासन अधिसूचना सामने रखे जाने से यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि संबंधित घटना या कार्रवाई के समय किस अधिकारी के पास कौन-सी वैधानिक शक्ति थी। अब पूरे मामले को समझने के लिए हाईकोर्ट के आदेश, डीएम कार्यालय के स्पष्टीकरण और 13 जनवरी 2020 की शासन अधिसूचना को साथ रखकर देखना होगा। यही दस्तावेज यह स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि संबंधित कार्रवाई के लिए वैधानिक रूप से जिम्मेदार प्राधिकारी कौन था और कमिश्नरेट व्यवस्था में उस समय अधिकारों का वास्तविक स्वरूप क्या था।

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