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Thursday, May 21, 2026
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    लॉयड बिजनेस स्कूल में “मानसिक स्वास्थ्य सम्मेलन 2026” का सफल आयोजन“मन के विषय: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भावनात्मक रूप से सशक्त युवाओं का निर्माण” विषय पर विशेषज्ञों ने साझा किए विचार

    Successful organization of “Mental Health Conference 2026” at Lloyd Business School. Expert shared views on the topic “Subject of Mind: Musically Building Young Students in the Age of Artificial Mystery”.

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    ग्रेटर नोएडा, द न्यूज क्लिक। लॉयड बिजनेस स्कूल में आज “मानसिक स्वास्थ्य सम्मेलन 2026” का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं, विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानसिक जागरूकता को लेकर सार्थक संवाद स्थापित करना था। कार्यक्रम में शिक्षा, चिकित्सा, योग, मनोविज्ञान एवं आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने भाग लिया।

    कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. वंदना अरोड़ा सेठी, समूह निदेशक, लॉयड ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी बन चुका है। उन्होंने विद्यार्थियों को भावनात्मक रूप से मजबूत, आत्म-जागरूक और मूल्य आधारित जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यवसाय निर्माण नहीं, बल्कि संतुलित, संवेदनशील और जागरूक व्यक्तित्व का विकास करना भी है।

    डॉ. वंदना अरोड़ा सेठी ने “मन” की शक्ति पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में मानसिक संतुलन और आत्म-जागरूकता जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने विद्यार्थियों और शिक्षकों को सकारात्मक सोच एवं आत्म-नियंत्रण के महत्व को समझाया।

    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, डॉ. राकेश कुमार, निदेशक, गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़, ग्रेटर नोएडा ने अपने संबोधन में कहा कि आज के समय में “मानसिक स्वास्थ्य कोई समस्या नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है।” उन्होंने विद्यार्थियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार एवं संतुलित उपयोग की सलाह दी। उन्होंने कहा कि तकनीक मानव जीवन को आसान बना सकती है, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ, सहानुभूति और भावनात्मक जुड़ाव ही समाज को मजबूत बनाते हैं। उन्होंने छात्रों को सहानुभूति, मानवीय मूल्यों और आपसी संवाद को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।

    सिस्टर मोनिका गुप्ता (बीके) ने ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं के माध्यम से “स्वयं के भीतर की यात्रा” पर प्रेरणादायी सत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने “वन पुरुष” की कहानी के माध्यम से जीवन में उद्देश्य के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में उद्देश्य नहीं है तो व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है, जबकि उद्देश्यपूर्ण जीवन जागरूकता और आत्म-संतुलन प्रदान करता है।

    उन्होंने वर्तमान समय को अस्थिरता, अनिश्चितता, जटिलता एवं अस्पष्टता का समय बताते हुए विभिन्न चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति का मन अतीत, वर्तमान और भविष्य के विचारों में उलझा रहता है, जिससे तनाव और भ्रम उत्पन्न होता है। उन्होंने सकारात्मक एवं शक्तिशाली विचारों, ध्यान, आत्म-जागरूकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सशक्तिकरण के साधन के रूप में उपयोग करने पर जोर दिया। “घर वापसी अभ्यास” के माध्यम से उन्होंने विद्यार्थियों को ध्यान का व्यावहारिक अनुभव भी कराया।

    इसके बाद मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अभिषेक पचौरी ने “आंतरिक जागरण” विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने योग, प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक मनोविज्ञान के समन्वय को मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने सकारात्मक एवं नकारात्मक तनाव के बीच अंतर स्पष्ट किया और जैन दर्शन तथा पतंजलि योग सूत्रों का उल्लेख करते हुए मानव जीवन की पाँच प्रमुख समस्याओं — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश — पर चर्चा की।

    उन्होंने मानसिक संतुलन के लिए तीन महत्वपूर्ण उपाय बताए —

    योग का अनुशासन
    निरंतर अभ्यास (कम से कम 21 दिनों तक)
    सही विधि से अभ्यास

    उन्होंने श्वास अभ्यास और व्यवहारिक अभ्यासों के माध्यम से मानसिक शांति बनाए रखने के उपाय भी बताए।

    कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण परिचर्चा सत्र रहा, जिसका संचालन डॉ. रिपुदमन गौर ने किया। पैनल में डॉ. विकास सक्सेना, डॉ. सौमेंद्र मोहंती, पायल गुप्ता एवं गुंजन चौधरी ने सहभागिता की।

    चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने कोविड के बाद के समय, बदलते वैश्विक परिदृश्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामाजिक माध्यमों और विद्यार्थियों में बढ़ती मानसिक समस्याओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की। पैनल में विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं, शिक्षकों के तनाव, अकेलेपन, छूट जाने के भय, सामाजिक घबराहट, मोबाइल और संवाद आधारित कृत्रिम माध्यमों की बढ़ती निर्भरता, नींद की समस्या एवं शारीरिक निष्क्रियता जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

    विशेषज्ञों ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पास जानकारी और स्मृति हो सकती है, लेकिन उसमें मानवीय संवेदनाएँ, आत्म-जागरूकता और अनुभव नहीं होते। उन्होंने विद्यार्थियों को वास्तविक सामाजिक संबंध बनाए रखने, परिवार और मित्रों से संवाद करने, दैनिक लेखन अपनाने, शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने और आत्म-प्रेरणा विकसित करने की सलाह दी।

    कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों एवं प्रतिभागियों ने इस सम्मेलन को अत्यंत ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायी एवं वर्तमान समय की आवश्यकता बताया। सम्मेलन ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ युवाओं को आत्म-संतुलन एवं भावनात्मक रूप से सशक्त बनने की दिशा में प्रेरित किया।

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